Wednesday, September 11, 2013

बलात्कारियों की दुनिया में दबी इंसानियत की चीख

मुंबई में एक बार फिर गैंग रेप की घटना ने इंसानियत को सकते में डाल दिया है। किसी जमाने में क्राइम सिटी दिल्ली हुआ करती थी, लेकिन लग रहा है जैसे अब इसकी परिभाषा बदल रही है। मुंबई को क्राइम और रेप सिटी का तमगा दिलाने को आतुर दिख रहे दरिंदे इन दिनों यहां सक्रिय हो चले हैं।
अभी महालक्ष्मी में शक्ति मिल कंपाउंड में हुए गैंग रेप का मामला ठंडा भी नहीं हुआ था कि यहां एक और गैंग रेप का मामला सामने आ गया है। इस बार शहर के बीचोबीच बांद्रा के निर्मल नगर में नाबालिग लड़की से दो युवकों ने रेप किया है। इन्होंने यहां कौमी एकता भी दिखाई है, क्योंकि गिरफ्तार आरोपी युवकों के नाम अख्तर कुरैशी और विजय कुमार हैं। हालांकि, इस मामले में पीडि़त नाबालिग लड़की की सहेली भी आरोपी है।
मुंबई ही नहीं, देश भर में रेप और गैंग रेप जैसी घटनाओं की आई बाढ़ लगातार इंसानियत की चूलें हिला रही हैं, लेकिन न तो हम सामाजिक तौर पर, न ही व्यक्तिगत तौर पर खुद की मानसिकता बदलने को तैयार हैं। जब भी ऐसी भयावह घटना होती है, तो चैनलों पर डिबेट शुरू हो जाते हैं, अखबारों के पन्ने न्यूज और व्यूज से रंग दिए जाते हैं, सेल्फ डिफेंस की बातें चलने लगती हैं, महिलाओं-लड़कियों के पहनावे पर फिकरे कसे जाते हैं, और तो और कई बुद्धिजीवी लड़कियों को देर रात (अब तो दिनदहाड़े भी रेप हो रहे हैं) या सूनसान इलाकों में अकेले जाने से मनाही की बात करने लगते हैं। इस बीच कोई भी इस ओर ध्यान भी नहीं देना चाहता कि समाज और इंसान की बदलती मानसिकता को पटरी पर कैसे लाया जाए।
पहले लोग हैवानियत और राक्षसी प्रवृत्ति बढऩे पर संतों की शरण में जाते थे, लेकिन अब तो नित्यानंद से लेकर आसाराम बापू तक ने जो भी तथाकथित उदाहरण पेश किए हैं, उससे वहां भी इंसानियत शर्मसार हो गई है। जब संत ही असंत हो चले, तो रेपिस्ट से भला कौन बचाए, क्योंकि जब मानसि·ता बीमार होती है, तो उसे स्वस्थ करने की जिम्मेदारी संत समाज की होती है, लेकिन जब संत समाज ही रेपिस्ट बन जाए, तो भला किसी भी समाज का भला कैसे संभव है?
रेप या गैंग रेप की घटना होने पर कुछ दिन गर्मा नर्म बहस के बाद मामला ठंडे बस्ते में चला जाता है, टीवी-अखबारों के लोगों को भी दूसरी खबरें मिल जाती हैं और वे रेप या गैंग रेप के खिलाफ अपनी आवाज का रुख बदल देते हैं। यूं पीठ घुमा लेते हैं, जैसे कुछ हुआ ही नहीं, और तो और मीडिया घरानों के मसीहा बने ऊंचे ओहदे वाले यह कहते सुने जाते हैं कि यार कितने दिन रेप चलाओगे, अब कौन देखेगा-सुनेगा-पढ़ेगा रेप और उससे जुड़ी बातें? इस सबके बीच रेप या गैंग रेप की शिकार लड़की की चीख मानों दब सी जाती है, फिर समाज उन्हें भुला देता है और इसका फायदा मिलता है आततायी को, जो फिर निकल पड़ता है अगले शिकार की तलाश में..! काश कि वह दिन लौट आता, जब मां-बहन-बेटी-पत्नी-दोस्त जैसे जहीन रिश्तों में इंसान बंध पाता!
-सर्वेश पाठक

Tuesday, September 3, 2013

आसाराम से निराशा

रेप की बढ़ती घटनाएं बदलते समाज का आइना

हते हैं समाज मन का दर्पण है, ऐसे में आजकल बढ़ती रेप की घटनाएं साफ संकेत दे रही हैं कि हमारा मन या समाज किस दिशा में बढ़ रहा है। दिल्ली गैंग रेप कांड की आंधी अभी थमी नहीं थी कि मुंबई की शक्ति मिल में भी पिछले दिनों गैंग रेप की घटना हो गई। हाल-फिलहाल एक और लड़की ने सामने आने की हिम्मत दिखाई और बताया कि उसके साथ भी उसी शक्ति मिल में जुलाई में गैंग रेप किया गया था। ऐसा लग रहा है, जैसे रेप आजकल का सबसे आसान क्राइम हो गया है, जो कभी भी कहीं भी और किसी के भी साथ हो सकता है। और तो और, संत पुरुषों पर भी बलात्कार के आरोप लगने लगे हैं, ताजा उदाहरण आसाराम बापू का सामने है, जो आजकल खासतौर पर चर्चा में है। हो भी क्यों नहीं, आखिर यह अपराध घिनौनतम या जघन्यतम ही नहीं, बल्कि दुर्दान्ततम भी है, जो सामान्य मनस्थिति वाला व्यक्ति कदापि नहीं कर सकता।
 रेपकांड में फंसे आसाराम बापू ने न केवल संत समाज को शर्मिंदा किया है, बल्कि मानव समाज को भी उसका बदलता चारित्रिक आइना दिखाया है। कहते हैं संत न छोड़े संतई, कोटिन मिले असंत, ऐसे में यह कैसे संभव है कि धर्म और अध्यात्म के संदेश प्रेषित करने वाले अधर्मी और कुध्यात्मी हो जाएं, लेकिन अब यह सच साबित हो रहा है। लोग मन की मैल साफ करने के लिए संत समागम करते हैं, लेकिन जब संत भी संतई की आड़ में दैहिक समागम करने लगे, तो मन की मैल साफ होना तो दूर, और गंदीली व भयावह हो जाएगी।
आसाराम बापू से जुड़े मसले में एक नई चीज और उभरकर सामने आई, उनके अंध अनुयायी यह भूल गए कि जिस बेटी के साथ ऐसी घटना हुई, उसकी मनोदशा क्या होगी! दिल्ली या मुंबई गैंग रेप केस में जिस कदर पब्लिक का गुस्सा फूटा, उससे लगा कि रेप के किसी भी आरोपी को लोग बर्दाश्त नहीं करते। लेकिन आसाराम बापू मामले में उनके बहुसंख्यक अनुयायी ऐसे संत की गिरफ्तारी के विरोध पर उतर आए, जिस पर बलात्कार का आरोप लगा। देश के कई शहरों-कस्बों में विरोध प्रदर्शन हुए, प्रदर्शनकारियों का तर्क था कि बापू पर मिथ्या आरोप लगा है। भई! आरोप तो आरोप होता है, फिर रेप के मामले में पकड़ा गया कौन आरोपी कहता है कि वह दोषी है! यहां यह भी ध्यान देने योग्य है कि अपराधी का साथ या उसे समर्थन देने वाला भी उतना ही दोषी माना जाता है, जितना अपराध करने वाला।
ऐसे में, क्या आसाराम बापू के समर्थक यह साबित करने पर तुले हैं कि वे सभी बलात्कार के आरोपी का सहयोग कर रहे हैं, फिर तो उन्हें भी बलात्कार जैसे घिनौनतम अपराध को प्रोत्साहन देने की सजा दी जानी चाहिए। अगर, यह बातें अतार्किक हैं, तो फिर किसी भी आरोपी का अंधानुसरण करने की आवश्यकता क्या है?
सर्वेश पाठक

Thursday, August 22, 2013

अंधश्रद्धा की आड़ में आसाराम बापू

संत (या यूं कहें तथाकथित!) आसाराम बापू पर लगे रेप के आरोप सभ्य समाज को असभ्यता का आइना दिखा रहे हैं। हो सकता है कि उन पर लगे बेबुनियाद हों, फिर भी कभी संस्कारी रहे भारत में आज असंस्कार इस कदर हावी हो गया है कि सदाचारी और बलात्कारी में ज्यादा फर्क नजर नहीं आता है। पुलिस इस मामले में आसाराम बापू से पूछताछ करने का मन बना रही है। उनके खिलाफ रेप का मामला दर्ज हो गया है। केस दर्ज होने के बाद आसाराम बापू की मुश्किलें लगातार बढ़ती जा रही हैं। मामला दर्ज होने के बाद उन पर गिरफ्तारी की तलवार लटक रही है। पूरा माहौल उनके विरोध में है।
इस प्रकरण के बहाने अगर हम बदलते सामाजिक ढांचे पर गौर करें, तो हमारा नैतिक पतन बड़ी तेजी के साथ हो रहा है। ये तो आसाराम बापू का मामला है, लेकिन इससे पहले भी हमारे समाज का कुत्सित चरित्र दर्शाती कई घटनाएं लोगों का जेहन ताजा करती रही हैं। अक्सर सुनने में आता है कि फलां जगह पर ढोंगी बाबा के कहने पर पिता ने बेटी से रेप कर दिया, या फलां जगह पर बेटा पैदा होने की आस में महिला की आबरू ढोंगी बाबा ने लूटी। शायद आसाराम बापू की जगह कोई ढोंगी बाबा होता, तो किसी क्षेत्रीय अखबार के भीतर के पन्ने पर सिंगल कॉलम की खबर लग गई होती, या शायद वह भी जगह नहीं मिलती और हमारा समाज अपने क्षीण होते चरित्र को प्रोत्साहित कर रहा होता। 
इतना ही नहीं, ढोंगी बाबाओं के खिलाफ आवाज उठाने वालों को सरेआम गोलियों से भूना जाता है, जैसा कि पुणे में अंधश्रद्धा निर्मूलन से जुड़े डॉ. नरेंद्र दाभोलकर के साथ हुआ। डॉ. दाभोलकर का मर्डर होने के बाद कुछ नेताओं ने सीधे हिंदू संगठनों पर उंगली उठा दी, जबकि उनके सहयोगियों ने दो बड़े बाबाओं का हाथ होने का संकेत दिया। बताया गया कि डॉ. दाभोलकर इन बाबाओं की काली करतूतों का पर्दाफाश कर उनका असली चेहरा लोगों के सामने उजागर करने वाले थे। इससे स्पष्ट है कि ढोंगी बाबाओं का जाल किस कदर हमारे समाज में विष बनकर फैला है और ये अपनी कुत्सित क्षुधा पूर्ति के लिए किस हद तक जा सकते हैं।
यहां बात सिर्फ डॉ. दाभोलकर के मर्डर की नहीं, या आसाराम बापू के रेप केस में फंसने या न फंसने की नहीं है। क्योंकि, ये तो एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। पाश्चात्य सभ्यता में लिपटता, चिपटता जा रहा हमारा समाज स्वतंत्रता, स्वच्छंदता की आड़ में जिस उच्छृंखलता की ओर बढ़ रहा है, वह आजकल हर जगह किसी न किसी रूप में रेप कर रहा है। कॉर्पोरेट कल्चर में तो तमाम जगहों पर ऐसे नरपिशाच घूम रहे हैं, जो अपने तईं जमकर महिलाओं, लड़कियों को भोग्या बना रहे हैं। इनमें मीडिया हाउसेज भी शामिल हैं, हालांकि बस इनके तरीके अलग-अलग हैं। इन जगहों पर न केस दर्ज हो रहे हैं, न ही कोई आवाज उठा रहा है, बस अंदर ही अंदर चीजें सुलग रही हैं। इनमें बदलाव तभी संभव है, जब एक सामाजिक क्रांति आए और लोग खुद ब खुद अपनी कुत्सित मानसिकता पर काबू कर उसे निर्मलता में बदलें।
सर्वेश पाठक

Saturday, August 10, 2013

फ्रीडम का बदलता कलेवर

आजादी के लिए प्राण आहूत करने वालों ने हमें स्वतंत्र हवा में सांस लेने का मौका ही नहीं दिया, बल्कि राष्ट्र निर्माण का जिम्मा भी सौंपा, लेकिन आज के युवा क्या शहीदों का सपने पर खरे उतरे! आज विश्व ग्लोबल विलेज बन गया, तो तकनीकी चरम पर! जहां रिमोट से चैनल बदलते हाथ भले थक जाएं, लेकिन चैनल्स की लिस्ट नहीं। आज सूचना का अधिकार है, तो दुव्र्यवस्था की पोल खोलने पर सुरक्षा मिलने की गारंटी भी। ऐसे में युवाओं के लिए गुलामी की कल्पना सूखाग्रस्त धरती पर पैदावार तलाशने जैसा है।

युवाओं के लिए स्वतंत्रता दिवस के मायने ध्वजारोहण, स्कूल-कॉलेज के समारोह, छुट्टी का एक दिन या टीवी, एफ एम पर देशभक्ति के गाने सुनना या फिर कुछ सरकारी-गैरसरकारी कार्यक्रमों में शिरकत करना रह गया है? आजादी के बारे में इस पीढ़ी की राय थोड़ी अलग भले हो, लेकिन स्वतंत्रता दिवस का जोश वैसा ही है। कॉन्फिडेंस के साथ यह पीढ़ी आजाद भारत का वारिस होने का दम भरती है और भ्रष्टाचार, अपराध को मिटाना चाहती है। साथ ही, यह व्यक्तिगत आजादी के लिए संघर्ष करने और मर मिटने तक को तैयार है।

ऑनलाइन इंडिपेंडेंसी

इंटरनेट अफेक्शन में रची-बसी यह पीढ़ी दिल की आजादी चाहती है और विचारों की स्वतंत्रता भी। निजता की
रक्षा के लिए यह खाप पंचायत के फरमानों को ठेंगा दिखाती है, तो जाति-धर्म के बंधन से इतर रिश्तों में बंधने का दुस्साहस करती है। खास बात तो यह है कि आज सलीम के साथ अनारकली भी चुपचाप दीवार में चुन जाने की जगह प्रेम पाने की ताकत रखती है, तो दिल जोडऩे के साथ तोडऩे (ब्रेकअप) की भी स्वतंत्रता रखती है। दूसरी ओर विवाह को बंधन और तरक्की में बाधा समझने वाली यह पीढ़ी लिव इन रिलेशन जैसे रिश्तों में सुरक्षित महसूस करती है, जहां न कोई बंधन हो और न ही सरोकार।

सपनों की नई सुबह

आत्मविश्वास से लबरेज युवा वर्ग पहनावे से कैरियर तक अपना एकाधिकार चाहता है। यह अपने मन से सपने बुनता है, उसे यथार्थ के धरातल पर उतारने के लिए संघर्ष करता है और फिर हौसलों से ख्वाहिशों को हकीकत में बदलने की पुरजोर कोशिश करता है। 28 वर्षीय करन दलाल मुंबई छोड़कर उत्तरांचल के एक गांव में कंप्यूटर इंजिनियरों की फौज तैयार कर रहे हैं। वे ऐसे बच्चों को कंप्यूटर सिखा रहे हैं, जो अभी इससे अनभिज्ञ हैं। करन नन्हें-मुन्नों को कंप्यूटर का ककहरा सिखा रहे हैं, ताकि वे ग्लोबल दुनिया का हाई-टेक हिस्सा बन सकें।
महिलाओं को भी सपने संजोने और उन्हें पूरा करने की आस जगी है। वह पायलट बन आसमान में उड़ सकती है, तो अंतरिक्ष में तारों से आंखें मिलाने की ताकत भी रखती हैं। फतवों को अनदेखा कर जिंदगी और अलग पहचान तलाशने में जुटी हैं। आज की नारी कहीं ज्यादा जागरूक है, यही वजह है कि न्यायालय ने सेना में भी उन्हें समान अधिकार देने की पहल की है।

सफलता हर कीमत पर

मौजूदा पीढ़ी के लिए आजादी के मायने आर्थिक मजबूती से ही है। उनकी नजर में फ्रीडम मतलब ‘मोर अर्निंग, मोर परचेजिंग’ से है यानी अगर वह आर्थिक तौर पर आजाद है, तभी खुद को सपनों की उड़ान भरने के लिए स्वतंत्रता महसूस करता है। ऐसे में, उसने जो रास्ता चुना वह है सफलता हर कीमत पर। सरकारी नौकरियों के बंधे बंधाएं वेतन की बजाय इसे पे पैकेज पर भरोसा है, यानी जितना बड़ा पैकेज उतनी बड़ी आजादी। आर्थिक स्वतंत्रता का यह मंत्र इस पीढ़ी के लिए कॉर्पोरेट शिक्षा के झरोखों से निकला है। रही सही कसर माता-पिता की उम्मीदों और शिक्षकों ने पूरी कर दी।

आजादी के युवा मायने

भारतीय युवा दो वर्गों में बंटा है, एक तरफ कुछ कर गुजरने का जोश, तो दूसरी तरफ स्वतंत्रता के नए और कुत्सित अर्थ को ही असली आजादी मानने वाला वर्ग। रेव पार्टियां या पब में जाना और मौजमस्ती के लिए शराब पीना युवाओं का फैशन है। एक सर्वे में 15 प्रतिशत युवाओं ने माना कि अपनी जगह बनाने के लिए न चाहते हुए भी शराब पीना पड़ता है। अजीब यह है कि इस सर्वे में उच्च शिक्षा प्राप्त युवाओं ने दूसरे युवाओं की तुलना में शराब पीने को सही ठहराया है।
कुल मिलाकर बात अगर स्वतंत्रता की करें तो वहां तक सबकुछ ठीक नजर आता है, लेकिन जब आजादी के मायने स्वच्छंदता का रूप धर लेते हैं, तो विकृति नजर आने लगती है। असली आजादी, गरिमा और मर्यादा की परिधि में रह कर वैचारिक रूप से परिवर्तन लाने की कोशिश को कहा जाना चाहिए, ना कि सिर्फ डिस्को थेक में अपना समय गुजारने और सेक्स तथा हिंसा को अपनी जिंदगी का लक्ष्य बना कर चलने को। ऐसा न हो कि स्वतंत्रता की आड़ में स्वच्छंदता को प्रोत्साहित कर अपनी ही जड़ें खोखली कर लें और खून-पसीने से मिली आजादी का इस्तेमाल हमें विकास की बजाय विनाश की ओर ले जाए।
सर्वेश पाठक

Tuesday, July 30, 2013

थाली में बंटती मौत

‘मिड-डे मील’ का कहर  

बिहार: 23 मौतें, उत्तराखंड: 25 बीमार, हरियाणा: 301 बीमार, मध्यप्रदेश: 33 बीमार, गोवा: 19 बीमार, उड़ीसा: भोजन में कीड़ा, महाराष्ट्र: 87 बोतल टॉनिक एक्सपायर्ड, महाराष्ट्र: अकोला 67 छात्राएं बीमार। 

मिड डे मील की सचाई

बिहार में मिड डे मील की थाली में बंटी मौत के जहर ने देश को हिला कर रख दिया। अभी उस घटना पर क्रोध में लिपटी प्रतिक्रियाओं का दौर जारी ही था कि देश के अन्य कई राज्यों से मिड डे मील संबंधी सरकारी तंत्र में लगे दीमक का खुलासा होने लगा। उत्तराखंड में महाप्रलय से बचे-खुचे नौनिहाल थाली के जहर का शिकार होने लगे और 25 बच्चे अस्पताल पहुंच गए। फिर, हरियाणा 301 स्कूली बच्चे मिड डे मील के बाद दी जाने वाली स्वास्थ्यवद्र्धक गोलियों से अस्वस्थ हो गए। यह सिललिला थमा नहीं और मध्यप्रदेश के बालाघाट में 33 बच्चे जहरीले भोजन का शिकार हो अस्पताल पहुंच गए, फिर गोवा में 19 छात्र बीमार पड़े। उड़ीसा में दोपहर के भोजन में कीड़ा मिला, तो झटपट वितरण रोका गया। ताजा घटना महाराष्ट्र के अकोला की है, जहां 67 छात्राएं खाना खाकर बीमार पड़ गईं, जिनमें 20 की हालत गंभीर है।
कुल मिलाकर देशभर में सैकड़ों बच्चे ‘मिड-डे मील’ का शिकार रहे हैं, लेकिन न तो शासन-प्रशासन को फर्क पड़ रहा है, न ही केंद्र या राज्य सरकारें इसके प्रति गंभीर हैं। सभी राजनीति· दल अपने-अपने तईं खुद की या फिर अपने नेताओं की मार्केटिंग में व्यस्त हैं, न तो किसी को देश की जनता से सरोकार है, न ही ‘मिड-डे मील’ की आड़ में ‘जहर-खुरानी’ का! उन्हें तो बस हाय धुन ‘धन’, हाय धुन ‘वोट’ और हाय धुन ‘कुर्सी’ से मतलब है। कोई देश की गरीब आबादी को 5 रुपये में, तो कोई 12 और कोई 33 रुपये में भर पेट भोजन कराने जैसा मजाक कर रहा है। पहले इक्का-दुक्का नेता मानसिक दिवालिएपन का शिकार लगते थे, अब ज्यादातर ऐसे हैं, जिनका मानसिक स्तर उनके उद्बोधनों से स्पष्ट हो जाता है। जनता के बीच से निकले, जनता द्वारा चुने गए ये जनार्दन कब दावानल बन गए समझ ही नहीं आया और जनता है कि मूकदर्शक बन इन नेताओं की ठिठोली आत्मसात कर रही है। अब तो लोग भ्रमित होने लगे हैं कि चुनाव आने पर वोट किसे देंगे, क्योंकि सस्ता भोजन, जहरीली थाली किसी एक राजनीतिक दल या सरकार की थाती नहीं रही! लोगों को यह भान भी नहीं होगा कि वह किस कदर इन सत्ता लोलुप नेताओं के चंगुल में फंसकर अपना एक मौका (वोट देने का) बेवजह और आसानी से गंवा देते हैं।
अब कहें भी, तो कैसे कहें कि ‘जागो इंडिया, जागो’, क्योंकि दिन चढ़े घंटों हो गए, जनता को लगता है कि यह भोर की नींद है, सो वह नेताओं के दिखाए दिग्भ्रमित करने वाली सुंदर, लुभावनी, सजीली व सपनीली दुनिया में गहरी निद्रा में लिप्त है। 
सर्वेश पाठक

Monday, July 8, 2013

इंडिया में नेताओं की मौत नहीं, मौज होती है!


The monday's BIG news is... China's former railways minister Liu Zhijun was sentenced to death with a two-year reprieve here on Monday for bribery and abuse of power. As well as the suspended death sentence, the Beijing No. 2 Intermediate People's Court deprived the 60-year-old of his political rights for life and confiscated all his personal property for taking bribes. Liu was also sentenced to 10 years in jail for abuse of power, according to the court verdict.   


चीन के सरकारी मीडिया के मुताबिक़ एक अदालत ने पूर्व रेल मंत्री लियु झिजुन को भ्रष्टाचार और सत्ता के दुरुपयोग का दोषी करार देते हुए निलंबित मौत की सजा सुनाई है। लियो झिजुन पर पिछले 25 वर्षों के दौरान एक करोड़ डॉलर की रिश्वत लेने के आरोप थे।

अब भारत के परिप्रेक्ष्य में देखें, तो यहां पद के दुरुपयोग करने वाले नेताओं की फेहरिस्त काफी लंबी है। शायद ही कोई ईमानदार नेता मिले, जो शिख से नख तक साफ-पाक हो। लेकिन यहां सजाए मौत तो दूर, ऐसे नेताओं की मौज ही मौज है। तमाम बुद्धिजीवी अपने-अपने तईं ऐसे लोगों पर कार्रवाई की मांग करते रहे हैं, लेकिन क्या मजाल ऐसा कोई कानून पारित हो जाए, जो भ्रष्टाचारियों को शिकस्त दे सके। अभी भी लोगों के जेहन में अण्णा हजारे ताजा हैं, जिन्होंने अपने आंदोलन से देश में नई क्रांति छेडऩे की कोशिश की, लेकिन नेताओं की ऐसी जमात जुटी कि न तो अण्णा का आंदोलन रहा, न ही अण्णा के सहयोगी उनके साथ रहे। और तो और बाद के दिनों में ऐसे खिचड़ी आंदोलन हुए कि देश की जनता (जो कुछ झिंझुड़ी थी) फिर मान बैठी कि उसका पोरसा-हाल जानने-पूछने वाला नहीं है। पद लोलुपता में सने-पुते नेता, मंत्री सभी यथावत हैं। अब यही लगता है कि कौन जलाए मशाल-ए-करप्शन, सब देखने-सुनने की बातें हैं। 
-आपका, सर्वेश...

Sunday, July 7, 2013

ब्लास्ट के बाद, जागो रे...!

अजीब विडंबना है इस देश की..! यहां खतरे की घंटी खतरे के बाद बजती है। बोधगया में सीरियल ब्लास्ट हुए, इसके बाद देश भर के चुनिंदा राज्यों व शहरों में हाई अलर्ट घोषित कर दिया गया। अपने-अपने तईं नेताओं ने भाषण शुरू कर दिए, सुरक्षा-व्यवस्था का जायजा लिया जाने लगा, जगह-जगह दर्शाया जाने लगा कि हम कितने सतर्क और जागरूक हैं?
यह सिलसिला पहली बार नहीं है, 1993 में हुए मुंबई बम धमाकों के बाद से हर बार रटे-रटाए डायलॉग सुनने में आने लगे। नेताओं की ओर से आतंकवाद को कड़ा जवाब देंगे, ऐसे हमले बर्दाश्त नहीं करेंगे, हमारी सुरक्षा-व्यवस्था मजबूत है, यहां परिंदा भी पर नहीं मार सकता सरीखे वक्तव्य लोगों को भ्रमित करते आ रहे हैं। चैनलों-अखबारों में बहस चलाई जाती है, चर्चा-सत्र होते हैं, डिबेट चलाते हैं, कैंडल मार्च निकलते हैं, सरकार-प्रशासन को बाहर बैठे लोग जी-भरकर कोसते हैं, फिर धीरे-धीरे सब नॉर्मल हो जाता है। पब्लिक भी अपनी दिनचर्या में लग जाती है। ..और यह सब तब तक नॉर्मल रहता है, जब तक कि दोबारा कोई ब्लास्ट जैसी घटना नहीं हो जाती! 
आखिर, इस तरह के हाई अलर्ट घटना होने से पहले क्यों नहीं होते, क्या सिर्फ ब्लास्ट होने का इंतजार किया जाता है कि जब ऐसा कुछ होगा, तो हाई अलर्ट किया जाएगा और अगर हाई अलर्ट रहता है, तो घटनाएं क्यों होती हैं? क्या हमारा सुरक्षा तंत्र हमें चैन से सांस लेने का भी मौका नहीं दे सकता? अगर, सुरक्षा तंत्र फेल है, तो भ्रम में रखने के लिए बनावटी बातें करने का क्या मतलब? 

Wednesday, June 26, 2013

जिंदगी को करीब से देखो, इसका चेहरा तुम्हें रुला देगा

आजकल हर किसी पर फेसबुक फीवर छाया हुआ है। पत्रकार हों या बेकार, स्टूडेंट्स हों या कामगार, तथाकथित पढ़े-लिखे हों या गंवार, कामकाजी हो या घरेलू शायद ही कुछ लोग होंगे, जो मामूली टेक्नोसेवी होने के बावजूद इस नेटवर्किंग साइट से न जुड़े हों। इनमें ज्यादातर लोग मूल्यों को ताक पर रखकर अपडेट हिट और लाइक्स के लिए जूझते नजर आते हैं। एक पत्रकार होने के नाम पर इस फेसबुकिया नाम की खुजली मुझे भी लग गई, फिर क्या था शुरू हो गया सिलसिला। लेकिन, हाल की एक घटना ने मन क्षीण कर दिया। 
एक मित्र कुछ हफ्ते पहले बनारस (काशी) की कमियां गिनाते हुए अपडेट कर दिए कि वहां तो गंगा में लाशें बहाई जाती हैं, कब डुबकी लगाते वक्त आपसे कोई लाश टकरा जाए। उस वक्त मैंने उन्हें टोका- भाईसाहब वहां लाशें बहाई नहीं जलाई जाती हैं, संभव है कहीं दूर दराज से लहरों में भटक आई कोई लाश तैरती दिख जाए, लेकिन इसका यह मतलब नहीं कि आप काशी की गंगा में लाशें तैराने लगें। बाद में मैंने उन्हें फोन पर भी टोका कि फेसबुक विश्वमंच है, इस पर अपने शहर या देश की कुंठित तस्वीर न रखें। 
बहरहाल, यह तो एक पहलू था। हाल में, उन्होंने बनारस की तारीफों में लिपटे कई अपडेट किए और बनारस से इश्क तक की बात कर डाली, लोगों को भी बनारस में डूबकर महसूस करने की सलाह दी। इस बार मैंने रिएक्शन दिए बगैर और किसी का नाम लिए बिना खुद अपडेट किया कि एक शहर से नफरत करने वाले उसे प्यार कैसे करने लगे। शायद यह टीआरपी का खेल है, जो गिरगिट की तरह रंग बदलने वालों ने शहर को अपनी लोकप्रियता का माध्यम बना लिया। यह कुछ नहीं, टीआरपी का खेल है। बस, फिर क्या था! शुरू हो गई शाब्दिक जंग और वे सीधे-सीधे नाराजगी जताने लगे। 
इतना ही नहीं, उन्होंने यह चिढ़ पहले मेरे अपडेट पर रिएक्शन देकर निकाली, फिर अपने लगातार अपने अपडेट देने लगे। वे ऐसे नाराज हुए जैसे यह राष्ट्रीय बहस का मुद्दा हो और मैं उन्हें प्रधानमंत्री बनने से रोक रहा हूं। बहस को अजीबो-गरीब मोड़ देते हुए वे शहर और शख्सियत की पड़ताल पर उतर आए। साथ में शुरू हो गई लॉबिंग, उन्होंने कई सहयोगियों को साथ लपेटा और जुट गए साबित करने पर कि मैं बेवजह उन्हें झुठला रहा हूं। 

दोहरे चरित्र का भयानक रूप 

कुल मिलाकर मैं समझ गया कि यह इंटरनेट है ही ऐसी चीज, जो कुछ भी उलट-पलट कर सकती है। यही वजह है कि उत्तराखंड में महाप्रलय आया, तो तमाम मीडिया ने अपने-अपने तईं उसे उछाला, परोसा। किसी ने इस मानवीय आपदा से खबर चुराई, तो कोई पुराने और झूठे वीडियो दिखाकर टीआरपी बढ़ाया। यही दृश्य फेसबुकियों के टीआरपी बढ़ाने की तकनीक में दिखा। बनारस से जुड़े अपडेट में शहर का भला हो, न हो! मित्रों के अपडेट पर अपडेट होते गए, लाइक्स और कॉमेंट्स की संख्या बढ़ती गई। आखिरकार, मैंने सोचा कुछ भी बोल, लिखकर पीछा छुड़ाओ! अन्यथा इस फेसबुक के चक्कर में बरसों पुरानी मित्रता लडख़ड़ा जाएगी। फिर एक गजल की लाइन मन में कौंध गई- 
जिंदगी को करीब से देखो, इसका चेहरा तुम्हें रुला देगा!!

-सर्वेश पाठक 

Thursday, July 8, 2010

‘बंद, मतलब बंद!’

कमरतोड़ महंगाई से जनता बेहाल है, लेकिन सरकार को जैसे कोई फर्क ही नहीं पड़ रहा है। हाल ही, में विपक्ष ने भारत बंद किया, कई जगहों पर यह सफल भी रहा, खासकर मुंबई में! लेकिन, इस शहर की फिजा कुछ अलग ही है, जहां हर खबर अपना असर जरूर दिखाती है। यहीं हाल, बंद की खबर का रहा।


यहां बंद बेहद कारगर रहा, खासकर टैक्सियां-ऑटो के चक्के तो रात में ही बंद हो गए। बंद विपक्ष का था, यहां शिवसेना ने कहा ‘बंद, मतलब बंद!’, इस पर महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना ने भी अपनी सहमति की मुहर लगा दी। फिर क्या था, जब बंद को दो-दो सेनाओं का बल प्राप्त हो जाए, तो फिर किसकी हिम्मत है, जो फैसले पर विरोध जताए। कौन रणबांकुरा है, जो समझाने की कोशिश करे, कि जनाब! महंगाई रोकने के लिए बंद की बजाय अन्य पहलुओं पर भी विचार किया जा सकता है। लेकिन, नहीं! सुझाव तो दूर, अगर आपात परिस्थिति में भी कोई नजर आ गया, तो वाहन के साथ-साथ अपने भी हाथ पैर तुड़वाने को तैयार रहे।

इतना ही नहीं, बंद समर्थकों को तो बस विरोध दर्शाना था, कुछ टीवी चैनलों को फोन घुमाया, फिर कुछ मिनटों के लिए लोकल ट्रेनें रोकीं, विजुएलिटी हुई। इसके बाद फोटो खिंचवाए और चल पड़े अखबारों के दफ्तर, ताकि अगले दिन बंद की गूंज अखबारों के मार्फत घर-घर ही नहीं, देश भर में गूंजे और गली मुहल्लों के नेता भी अपनी पार्टी प्रमुख की नजर में आ आगामी चुनाव के लिए अपना अनुभवी डाटा तैयार कर लिए। ये तो ऐसे बहाने हैं, जिनमें शहर की रफ्तार रोककर बोलते हैं, जनता समर्थन कर रही है। ये कौन बताए कि जनता को आंदोलन नहीं महंगाई पर लगाम चाहिए!

Wednesday, November 25, 2009

26/11... नमन या जश्न!

26/11 की बरसी है! लेकिन, यहां नमन की जगह जश्न जैसा रूप दिया जा रहा है 26/11 की घटना को! अटपटा जरूर लगता है, पर मीडिया पूरे जी जान से जुटा है 26/11 की घटना के जख्मों को कुरेदने के बहाने अपने अपने स्तर पर दर्शकों, श्रोताओं और पाठकों को रिझाने में! जिसे देखो, जहां देखो, वहीं 26/11 का राग अलाप रहा है, शायद ही कुछ लोग होंगे, जो सही मायने में शहीदों को याद कर तहेदिल से नम होंगे। बाकी तो बस... जुटे हुए है अपनी अपनी भुनाने में, कैसे करें, क्या करें कि सबका फोकस हमारी ओर हो जाए, हद तो तब हो गई है, जब शहीद पुलिस अधिकारियों की विधवाएं भी मीडिया में छाए रहने को आतुर दिख रही हैं।
कसाब को जिंदा पकडऩे के चक्कर जान गंवाने वाले शहीद तुकाराम ओंबले की लड़की वैशाली को बीते दिनों एक स्कूल ने तीन लाख रुपए की सहायता राशि दी, पर उसने राशि लौटाते हुए अनुरोध किया कि यह रकम जरूरतमंद बच्चों के कल्याणार्थ इस्तेमाल की जाए। वहीं, कुछ शहीद पुलिस अधिकारियों की विधवाएं हाल ही में दिल्ली जाकर सोनिया गांधी से मिलीं और उन्हें याद दिलाया कि उनके परिवार को पेट्रोल पंप दिए जाने का वादा किया गया है। श्रीमती गांधी ने भी आनन फानन में तत्काल पेट्रोलियम मंत्री मुरली देवड़ा को फोन कर शहीदों की विधवाओं को पेट्रोल पंप देने को कहा, साथ ही अन्य सहायता का भी आश्वासन दिया। जबकि, इन विधवाओं के सहायतार्थ हर महीने एक बड़ी रकम दी जाती है। इतना ही नहीं, इनमें एक शहीद की विधवा की डायरी आगामी 5-6 महीनों तक विविध आयोजनों के लिए व्यस्त कार्यक्रमों से भरी पड़ी है। ये विधवाएं जहां तहां कार्यक्रमों में मुम्बई पुलिस को कोसती नजर आ जाती हैं, पर कोई इनसे यह नहीं पूछता कि उसी प्रशासन मेें इनके पति भी तो थे और वे भी उतने ही जिम्मेदार थे, जितना मुम्बई पुलिस का आम सिपाही! मुम्बईकरों या देशवासियों को शहीद अधिकारियों की विश्वसनीयता या शहादत पर संदेह नहीं, पर एक प्रश्न सहज ही बार बार उठता है कि तीन आला अधिकारी एक साथ एक गाड़ी में कैसे घूम रहे थे, यह संयोग भी कैसे बन गया और आतंकवादी बिना जोखिम कैसे इतने तेज तर्रार पुलिसवालों को शहीद बना डाले? शहादत के बाद इस तरह की बातें अनुचित जरूर है, पर क्या वे विधवाएं भावनाहीन हो गई हैं, जिन्हें पति की शहादत पर पेट्रोलपंप चाहिए?

Monday, September 28, 2009

विजय रावण की!

देश भर ने विजय दशमी मनाई, मुम्बई भी रावण का पुतला जलाने में पीछे नहीं रही। लेकिन, हर साल की तरह इस बार भी वहीं यक्ष प्रश्न कितने रावण जलाओगे- ग्लोबल वार्मिंग से लेकर ग्लोबल रिशेसन तक, पड़ोसी (देशों) की टेनशन से लेकर टेरेरिज्म तक, महंगाई से लेकर तनहाई तक, बीमारी से महामारी तक, राजनीति से समाज तक, साहित्य से पत्रकारिता तक, अर्श से फर्श और जीवन के उत्कर्ष (लिंग जांच व भ्रूण हत्या) तक हर डग पर रावण की दहाड़ व धमक महसूस की जा सकती है। फिर भी, हम कहते हैं कि हमने बुराई पर अच्छाई की जीत का पर्व मना लिया है, रावण को जला दिया है।
सर्वेश पाठक

Monday, September 7, 2009

कहीं यह हमले की तैयारी तो नहीं...

पिछले कुछ दिनों में पाकिस्तान की सैन्य गतिविधियां और युद्धक हथियारों में बढ़ोतरी और महज 15 दिनों के भीतर चीन की सीमा पर भारत में चीनियों की घुसपैठ। इन दोनों घटनाओं को महज संयोग नहीं कहा जा सकता। क्योंकि यदि यह संयोग होता, तो एक साथ नहीं होता। इन घटनाओं से इन अंदेशों को बल मिलता है कि कहीं पड़ोसी देशों ने भारत के खिलाफ गुप्त समझौते तो नहीं कर लिए और मौके की तलाश में हैं कि कब कुछ गड़बड़ हो और हमारे देश पर हमला बोल दें।

इधर भारत सरकार कार्रवाई की बजाय महज एतराज जताने और अमरीका से दबाव डलवाने की रणनीति अपनाने का काम कर रही है। दोनों पड़ोसी देश (चीन और पाकिस्तान) शायद इन्हीं बातों का इंतजार कर रहे हैं कि भारत और विश्व के दूसरे देशों की प्रतिक्रिया क्या है, अगर मामला ढुलमुल हो, तो आगे हमले की तैयारियां की जाएं और भारत को दोनों ओर से एकसाथ हमला कर कमजोर और टूटने पर मजबूर किया जाए। अभी आज ही कोलकाता में इराक से आए एक जहाज में भारी मात्रा में हथियार और गोलाबारूद बरामद हुआ, जो चीन की उड़ान भरने जा रहा था।

अत: इन घटनाओं को सामान्य नहीं देखा जाना चाहिए और सरकार को कठोर होना ही होगा, तभी ऐसी घटनाओं पर काबू पाया जा सकेगा और अमरीका जैसे देशों में भी सशक्त भारत का संदेश पहुंचेगा।

Monday, August 17, 2009

आ...स्वाइन मुझे मार!

सर्वेश पाठक
इन दिनों हर कहीं स्वाइन फ्लू प्रमुख विषय है चर्चा का! करीब तीन महीने हो गए जब इसकी चर्चा शुरू हुई, अब यह कई देशों की सैर करते हुए भारत में कई प्रदेशों तक अपनी जड़े फैला चुका है।
इसी बीच, बीते दिनों मुम्बई में आया गोविंदा (दही हंडी महोत्सव) और बहा ले गया स्वाइन फ्लू के ज्वार को... हमें भी मौका मिल गया लिखने को! हर चैनल, हर अखबार, जहां देखों स्वाइन फ्लू ही स्वाइन फ्लू था। जैसे ही यहां गोविंदा निकले खबरों में छा गए, फिर स्वतंत्रता दिवस और अब अन्य खबरें... स्वाइन फ्लू पहुंच गया, तीसरे पायदान पर... पुणे और बंगलोर के बाद मुम्बई ही सबसे करीब है स्वाइन फ्लू के, लेकिन जब यहां एयरपोर्ट पर विदेशी यात्री आ रहे थे, तो किसी ने उन्हें रोकने और एहतियात बरतने की सजगता नहीं अपनाई, जब संक्रमण फैला, तो लगे सतर्कता बरतने।
अगर कोशिश की गई होती और यात्रियों को एयरपोर्ट पर रोक कर जांच पड़ताल, इलाज आदि किया होता अथवा उन्हें एयरपोर्ट से ही वापस भेजा होता (नियमों का हवाला देते हुए, जैसा कि विदेशी धरती पर भारतीयों के साथ होता है), तो शायद स्थिति इतनी भयावह नहीं होती। लेकिन, उस समय तो हर कोई यह कहता था कि ऐसी बीमारी यहां नहीं फैल सकती और अब यह देश के कोने कोने तक जा चुकी है। अब सतर्कता ही बचाव है, चाहे वह बाबा रामदेव की गिलोय हो या अन्य डॉक्टरों, हकीमों व वैद्यों के उपाय, इन्हें अपनाकर ही स्वाइन फ्लू को रोका या मिटाया जा सकता है।

Thursday, June 18, 2009

...इनको भी तो लिफ्ट करा दे!

ऑस्ट्रेलिया में धधकी मुम्बई जैसी आग
इन दिनों ऑस्ट्रेलिया में भारतीय छात्रों की आए दिन पिटाई हो रही है। कब किस गली में कौन सा भारतीय छात्र आस्ट्रेलियाई लोगों का शिकार बनेगा, यह वो खुद भी नहीं जानता होगा। ऐसे में, पिछले दिनों आम चुनाव के बाद राज व उद्धव ठाकरे की एक दूसरे को लेकर बयानबाजी की याद आ जाती है, जिसमें राज ठाकरे ने कहा कि आगामी महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव के बाद महाराष्ट्र सरकार एमएनएस तय करेगी। इसके जवाब में शिवसेना के कार्यकारी अध्यक्ष उद्धव ठाकरे ने कहा कि महाराष्ट्र सरकार ही क्या, अब तो ब्रिटेन व विश्व के दूसरे देशों के राष्ट्राध्यक्ष और अमेरिका के राष्ट्रपति भी राज ठाकरे ही तय करेंगे।
इन वक्तव्यों में भले ही गहराई न हो और ये महज राजनीतिक लड़ाई हो, लेकिन ऑस्ट्रेलिया की घटनाओं ने राज ठाकरे को यह मौका दे दिया है कि वे वहां एमएनएस कार्यकर्ताओं को भेजे और वहां आगे की सरकार सुनिश्चित कराएं! क्योंकि, वहां पिटने वाले भारतीय छात्रों में मुम्बई और महाराष्ट्र के छात्र भी शामिल हैं, जो महज शिक्षा या रोजगार के लिए वहां जा पहुंचे हैं। उन्हें पीटने वाले ऑस्ट्रेलियाई भी उनसे यह नहीं पूछ रहे हैं कि 'तुम राज ठाकरे साहब की धरती के हो, या नहीं! वे तो, सिर्फ 'ब्लडी इंडियंस कहकर मारपीट शुरू कर दे रहे हैं। ऐसे में, राजा साहेब की यह जिम्मेदारी बनती है कि वे राष्ट्र और महाराष्ट्र की रक्षा करें और वहां भारतीयों को पीटने वालों को समझाएं कि ऐसा करना कहां तक सही होगा। आखिर अलगाव वाद की यह आग तो उन्हीं का दिया विशेषण है, ऑस्ट्रेलियाई तो महज राजा साहेब की मोनोपोली को आगे बढ़ा रहे हैं।
सर्वेश पाठक

Wednesday, May 27, 2009

कब बुझेगी आतंक की आग

सर्वेश पाठक
लाहौर की घटना ने एक बार फिर साबित कर दिया कि आतंक का कोई मजहब नहीं होता और सांप को पालोगे, तो वो काटेगा ही... लेकिन शायद अभी भी पाकिस्तान की समझ में यह बात नहीं आए क्योंकि कुछ दिन पहले पाक ने भारत से मदद के नाम पर सीमा से सेना हटाने की गुजारिश की थी, जबकि सीमा पर आतंकी घुसपैठ बरकरार है। ऐसे में, जाहिर है कि पाक अपने घर की कलह दूर करने में अभी भी ज्यादा सक्रिय नहीं है, बल्कि सिर्फ बयान बाजी के जरिए ऐसी वारदातों से पीछा छुड़ाना चाहता है।
पड़ोसी देशों में हो रही हलचल से भारत भी शायद ही अछूता रहे। यहां स्थिर सरकार के लिए चुनौतियां बढ़ सकती हैं, क्योंकि पाकिस्तान में लगी आग की आंच भारत तक आने की संभावना बढ़ी रहेगी। ऐसे में, यहां देश के भीतर और बाहर दोनों ही सुरक्षा का ध्यान देना होगा।
जहां तक सुरक्षा का प्रश्न है, तो अभी दो दिन पहले ही मुम्बई के एयरपोर्ट पर महज तीन बदमाशों ने दिखा दिया कि हमारी आंतरिक सुरक्षा की मजबूत है, वह भी तब जब देश की सबसे बड़ी आतंकी घटना को महज छह माह हुए हों। तो, मित्रों हमें और आपको भी हमेशा आतंक और अराजकता से रूबरू होने के अंदेशे को बरकरार रखना होगा। अपनी सुरक्षा अपने दम पर ही संभव है, शासन प्रशासन से बहुत ज्यादा उम्मीदें पालने की जरूरत नहीं..!

Sunday, May 17, 2009

लोकतंत्र के बहाने ' राज' तंत्र की तैयारी

लोकतंत्र के पंद्रहवें महापर्व के संपन्न होते ही सरकार के गठन की तैयारियां शुरू हो चुकी हैं। इस बार के आम चुनाव में कई चीजें खास रहीं, जिसमें एक यह भी था कि दिल्ली की सभी सात सीटों के साथ साथ मुम्बई की भी सभी छहों सीटें पर यूपीए ने ही जीत का झंडा बुलंद किया। हालांकि, यहां यूपीए की जीत में स्थानीय दल महाराष्टï्र नवनिर्माण सेना की भी महती भूमिका रही। एकमात्र प्रिया दत्त की सीट छोड़ दें, तो बाकी की सीटों पर यूपीए प्रत्याशी लडख़ड़ाते हुए जीते और वह भी शिवसेना मनसे में वोट बंटने से उनकी जीत हो सकी। दक्षिण मुम्बई में तो हालात ऐसे रहे कि मनसे के बालानांदगावकर दूसरे स्थान पर रहे और मिलिंद देवड़ा को जीत के लिए कड़ी मशक्कत करनी पड़ी। महाराष्टï्र में लोकसभा चुनाव को विधानसभा की तैयारियों के तौर पर देखा जा रहा है, जो अगले छह महीनों बाद होना है। इस चुनाव परिणाम ने हार के बावजूद मनसे नेताओं व कार्यकर्ताओं में जोश भर दिया है और इस जोशों जुनून का खामियाजा निश्चित तौर पर उत्तर भारतीयों को भुगतना पड़ सकता है। संभवत: मनसे की रणनीति का राजनीतिक लाभ लेने के लिए कांग्रेस एनसीपी पहले की तरह आगे भी खामोश रहे, क्योंकि वे कार्रवाई करेंगे, तो मराठी वोट बैंक गड़बड़ाने का डर होगा। ऐसे में, राष्टï्रीय एकता व सामाजिक सौहार्द की दुहाई देने वाले कांग्रेसी भी यहां की भाषा में भइया लोगों का साथ नहीं दे पाएंगे। तो, जनाब॥ इंतजार कीजिए वैमनस्यता की अगली कार्रवाई का.. जिसकी आशंका यहां रहने वालों को अभी से खाए जा रही है।

Saturday, May 2, 2009

रिसेशन, इलेक्शन और मीडिया का सेलिब्रेशन

बीते कुछ माह से हर कहीं रिसेशन यानी मंदी की मार हर आमोखास पर पड़ रही है, जिसमें मीडिया भी शामिल है। कुछ तो मंदी की हकीकत, कुछ मंदी के बहाने मीडिया हाउसेस द्वारा पत्रकारों को उनकी औकात बताने की हकीकत! कुल मिलाकर मंदी में व्यापारियों के चेहरों पर तो मुर्दनी छाई ही है, लेकिन नौकरी पेशा लोगों के चेहरे भी हरियाली नहीं जता पा रहे...इन सबमें सबसे कमजोर कोई दिख रहा है, तो वह पत्रकार, शायद ऐसा भी हो सकता है कि अपनी बीमारी हर इंसान को घातक लगती है।
मंदी तो है, आंशिक या अत्यधिक, जो भी हो... रिसेशन के बीच इलेक्शन आया, तो हर किसी के मुनाफे की बयार बह निकली। इस रेस में भी मीडिया पीछे नहीं रही, पहले ही पत्रकारों को रिसेशन का भूत दिखाकर डरा चुके मीडिया घरानों ने नेताओं को डराया, या यूं कहें कि पोलाइट भाषा में बताया कि आप हमारे शरणागत हो जाओ॥ जीत की भविष्यवाणी हम करेंगे। कुछ जगहों पर 'जय होÓ और 'भय होÓ एक साथ गूंजा, दूसरे शब्दों में मीडिया ने भी 'भय होÓ के बहाने नेताओं और पार्टियों की 'जय होÓ की और बदले में पाई मोटी रकम।
... तो अब कैसे कहें कि रिसेशन है, हमें तो यही लगता है कि यह रिसेशन सिर्फ कमजोरों के लिए है, मीडिया प्रबंधनों के लिए मजबूती के साथ यह रिसेशन बलशाली भी है, क्योंकि यह तो मुनाफा ही दे रहा है। एक ओर मंदी का भय दिखाकर पत्रकारों को निकालो, तो दूसरी ओर अपनी ताकत दिखाकर नेताओं की फोटो और समाचार निकालो...
अब भइया, लोग तो कहते हैं कि लालू ही मैनेजमेंट गुरू हैं, जो घाटे की रेल को मुनाफे की पटरी पर ले आए.. लेकिन मेरा तो मानना है कि गुरू गुड़ ही रह गए और मैनेजमेंट फंडा सीखकर मीडिया हाउसेस चीनी हो गए.. और हों भी क्यों न रिसेशन सबके लिए एक जैसा तो हो नहीं सकता.. आखिर कोई तो इसे सेलिब्रेशन में बदलेगा ही, फिर अपने को तुर्रम समझने वाले पत्रकार ना सही, उनके ऊपर विराजमान उनके मालिक ही सही...!

Sunday, April 26, 2009

लोकसभा के बहाने विधानसभा की तैयारी...

महाराष्ट में लोकसभा चुनाव के दो चरण पूरे हो चुके हैं और तीसरे चरण का मतदान 30 अप्रैल को होना हैं, लेकिन यहां की सियासत कुछ दूसरे ही मूड की नजर आ रही है। एक ओर जहां बड़ी पार्टियों की नजर केंद्र पर विराजना है, तो छोटी पार्टियां राज्य में अपनी स्थिति मजबूत करने पर जुटती दिख रही हैं।
इन्हीं में एक हैं राज ठाकरे और उनकी पार्टी महाराष्टï्र नवनिर्माण सेना यानी एमएनएस! यूं तो राज ठाकरे लोकसभा चुनाव प्रचार कर रहे हैं, लेकिन वे मराठी मुद्दे को जिंदा रखे हुए हैं और उन्हें शायद बेहतर पता है कि सिर्फ इसी मुद्दे को भुनाकर वे राज्य विधानसभा चुनावों में अपना धरातल मजबूत कर सकते हैं। शायद आदर्श आचार संहिता को ध्यान मेें रखकर वे फिलहाल खामोशी के साथ ही सही, लेकिन यह बोलने से नहीं चूक रहे हैं कि चुनाव बाद उनकी सेना का आंदोलन तेज होगा और वह भी मराठी हित में... अब यह तो मराठी भी बेहतर जानते होंगे और जिनके खिलाफ यह आंदोलन शुरू होगा, वह भी काफी गहराई से जानते होंगे कि आम चुनाव बीतने के बाद क्या हो सकता है।
सच तो यह है कि सामाजिक जागरुकता की कमी का फायदा ये नेता बखूबी उठाना जानते हैं और भोली भाली जनता की उसी कमजोर नस पर उंगली रखते हैं, जहां से इन्हें राजनीतिक लाभ मिल सके। यह जानते तो सभी हैं, लेकिन राजनेताओं की लच्छेदार भाषा में हर कोई उलझ जाता है, फिर राज ठाकरे जैसे लोग इसका फायदा क्यों न उठाएं?

Thursday, April 23, 2009

जरा गौर फरमाएं...

...न जाने कितने लोगों के पास से गुजरते हुए यह संदेश आखिरकार मेरे मोबाइल तक आ पहुंचा, लेकिन मैने इसे आगे बढ़ाने की बजाय इस पर बहस चलाने का मन बनाया। हालांकि, मेरे विचार इसे इतर हैं और मै किसी भी प्रकार की हिंसा का विरोध करता हूं। तो, इसे पढ़ें व इसके बारे में अपने विचार दें...

FICTIONAL CHARACTOR

Today... nothing for Amarnath। Supporting islamic terrorist is secularism, killing indians is patriotism। Babri masjid is issue, 100 hindu temples demolised is development। muslim die it is killing, hindu dies it fate. hindu should follow rules, muslim follow “NO RULE” policy. “Allah” is God, “Ram” is ckers. 5 muslims die in malegaon are important, 1000 died in other blast are crap. Reservations for muslims, blast for hindus. Godhara kand is accident, gujrat riots are preplanned. 15 percent muslims are human, 85 percent hindus are insects. malegaon blasts are only blasts, other blasts are diwali craker. Afzal guru is a patriot, Bhagat singh & Sadhvi are terrorists. SIMI, IM are social service organisations, RSS, VHP are terrorist organisations.

मेरे विचार ...

उपरोक्त के संबंध में मेरा मानना है कि हिंसा कोई भी करे, वो हिंसा ही है और इसे रोकने में भी हमारी भूमिका अहम होनी चाहिए। मैने एक बार ओशो का एक उद्धरण पढ़ा था, जिसमें कहा गया था, कि जब तक सीमाएं रहेंगी, तब तक हिंसा जारी रहेगी। इसका यही उपाय है कि हम उन सीमा रेखाओं के खिलाफ लड़ाई लड़ें, जो हमने जाति, धर्म, समाज, संप्रदाय, गांव, शहर, राज्य, देश के रूप में अपने और अपनों के बीच खड़ी कर रखी हैं। इसके अलावा हमें राजनीतिज्ञों के बहकावे में न आकर अपने भीतर झांकना चाहिए, क्योंकि चाहें पांच मरें या पचास हजार... कीमत तो मानवता को ही चुकानी पड़ती है। अगर मनुष्यों के बीच भेदभाव खत्म हो जाए, तो संघर्ष अपने आप रुक जाएंगे और फिर न हथियार की आवश्यकता होगी और ना ही कहीं किसी प्रकार के ब्लास्ट होंगे। चलिए... आपका क्या कहना है?

Thursday, December 4, 2008

हमलों के बाद राष्ट्र और महाराष्ट्र !


लोगों ने कभी सोचा भी नहीं होगा कि देश इस दुर्दशा से गुजरेगा, लेकिन आजादी के महज सासालों बाद चंद लोग आए और खुलेआम मुंबई के लोगों को मौत के घाट उतारा । इतना ही नहीं, साठ घंटों की जद्दोजहद के बाद जाकर मुंबई आतंकियों से आजाद हुआ । ये घटना आजाद भारत की है।


फिलहाल कार्रवाई के नाम पर दिल्ली से लेकर महाराष्ट्र तक केवल इस्तीफे । अमेरिकी विदेश मंत्री भारत आती हैं और सीधे तौर पर कहती है कि युद्ध छोड़ कर सबकुछ करो , मतलब पाकिस्तान पर हमला मत करो । इतना ही नहीं , ऍफ़बीआई बिना भारत सरकार की अनुमति लिए देश की धरती पर उतरती है और जांच के नाम पर जबरन पूरे मुंबई की पड़ताल करती है ।


और हमारी सरकार ऐतराज जताने की बजाए कुर्सी की बन्दर बाँट में लगी हुयी है । केन्द्र में एक विफल वित्त मंत्री को रक्षा मंत्री बना दिया तो महाराष्ट्र में अभी भी धींगा मुश्ती जारी है । ... और हम देश वासियों के पास इस नाटक को देखने के अलावा कोई चारा नही दिख रहा ... तो , जनाब ! इन्तजार कीजिए कि लार्ड क्लाइव की तर्ज पर ओबामा देश में घुस आए और हम अंग्रेजों के बाद अमरीकीयों के गुलाम बन जाएँ ।