Saturday, August 10, 2013

फ्रीडम का बदलता कलेवर

आजादी के लिए प्राण आहूत करने वालों ने हमें स्वतंत्र हवा में सांस लेने का मौका ही नहीं दिया, बल्कि राष्ट्र निर्माण का जिम्मा भी सौंपा, लेकिन आज के युवा क्या शहीदों का सपने पर खरे उतरे! आज विश्व ग्लोबल विलेज बन गया, तो तकनीकी चरम पर! जहां रिमोट से चैनल बदलते हाथ भले थक जाएं, लेकिन चैनल्स की लिस्ट नहीं। आज सूचना का अधिकार है, तो दुव्र्यवस्था की पोल खोलने पर सुरक्षा मिलने की गारंटी भी। ऐसे में युवाओं के लिए गुलामी की कल्पना सूखाग्रस्त धरती पर पैदावार तलाशने जैसा है।

युवाओं के लिए स्वतंत्रता दिवस के मायने ध्वजारोहण, स्कूल-कॉलेज के समारोह, छुट्टी का एक दिन या टीवी, एफ एम पर देशभक्ति के गाने सुनना या फिर कुछ सरकारी-गैरसरकारी कार्यक्रमों में शिरकत करना रह गया है? आजादी के बारे में इस पीढ़ी की राय थोड़ी अलग भले हो, लेकिन स्वतंत्रता दिवस का जोश वैसा ही है। कॉन्फिडेंस के साथ यह पीढ़ी आजाद भारत का वारिस होने का दम भरती है और भ्रष्टाचार, अपराध को मिटाना चाहती है। साथ ही, यह व्यक्तिगत आजादी के लिए संघर्ष करने और मर मिटने तक को तैयार है।

ऑनलाइन इंडिपेंडेंसी

इंटरनेट अफेक्शन में रची-बसी यह पीढ़ी दिल की आजादी चाहती है और विचारों की स्वतंत्रता भी। निजता की
रक्षा के लिए यह खाप पंचायत के फरमानों को ठेंगा दिखाती है, तो जाति-धर्म के बंधन से इतर रिश्तों में बंधने का दुस्साहस करती है। खास बात तो यह है कि आज सलीम के साथ अनारकली भी चुपचाप दीवार में चुन जाने की जगह प्रेम पाने की ताकत रखती है, तो दिल जोडऩे के साथ तोडऩे (ब्रेकअप) की भी स्वतंत्रता रखती है। दूसरी ओर विवाह को बंधन और तरक्की में बाधा समझने वाली यह पीढ़ी लिव इन रिलेशन जैसे रिश्तों में सुरक्षित महसूस करती है, जहां न कोई बंधन हो और न ही सरोकार।

सपनों की नई सुबह

आत्मविश्वास से लबरेज युवा वर्ग पहनावे से कैरियर तक अपना एकाधिकार चाहता है। यह अपने मन से सपने बुनता है, उसे यथार्थ के धरातल पर उतारने के लिए संघर्ष करता है और फिर हौसलों से ख्वाहिशों को हकीकत में बदलने की पुरजोर कोशिश करता है। 28 वर्षीय करन दलाल मुंबई छोड़कर उत्तरांचल के एक गांव में कंप्यूटर इंजिनियरों की फौज तैयार कर रहे हैं। वे ऐसे बच्चों को कंप्यूटर सिखा रहे हैं, जो अभी इससे अनभिज्ञ हैं। करन नन्हें-मुन्नों को कंप्यूटर का ककहरा सिखा रहे हैं, ताकि वे ग्लोबल दुनिया का हाई-टेक हिस्सा बन सकें।
महिलाओं को भी सपने संजोने और उन्हें पूरा करने की आस जगी है। वह पायलट बन आसमान में उड़ सकती है, तो अंतरिक्ष में तारों से आंखें मिलाने की ताकत भी रखती हैं। फतवों को अनदेखा कर जिंदगी और अलग पहचान तलाशने में जुटी हैं। आज की नारी कहीं ज्यादा जागरूक है, यही वजह है कि न्यायालय ने सेना में भी उन्हें समान अधिकार देने की पहल की है।

सफलता हर कीमत पर

मौजूदा पीढ़ी के लिए आजादी के मायने आर्थिक मजबूती से ही है। उनकी नजर में फ्रीडम मतलब ‘मोर अर्निंग, मोर परचेजिंग’ से है यानी अगर वह आर्थिक तौर पर आजाद है, तभी खुद को सपनों की उड़ान भरने के लिए स्वतंत्रता महसूस करता है। ऐसे में, उसने जो रास्ता चुना वह है सफलता हर कीमत पर। सरकारी नौकरियों के बंधे बंधाएं वेतन की बजाय इसे पे पैकेज पर भरोसा है, यानी जितना बड़ा पैकेज उतनी बड़ी आजादी। आर्थिक स्वतंत्रता का यह मंत्र इस पीढ़ी के लिए कॉर्पोरेट शिक्षा के झरोखों से निकला है। रही सही कसर माता-पिता की उम्मीदों और शिक्षकों ने पूरी कर दी।

आजादी के युवा मायने

भारतीय युवा दो वर्गों में बंटा है, एक तरफ कुछ कर गुजरने का जोश, तो दूसरी तरफ स्वतंत्रता के नए और कुत्सित अर्थ को ही असली आजादी मानने वाला वर्ग। रेव पार्टियां या पब में जाना और मौजमस्ती के लिए शराब पीना युवाओं का फैशन है। एक सर्वे में 15 प्रतिशत युवाओं ने माना कि अपनी जगह बनाने के लिए न चाहते हुए भी शराब पीना पड़ता है। अजीब यह है कि इस सर्वे में उच्च शिक्षा प्राप्त युवाओं ने दूसरे युवाओं की तुलना में शराब पीने को सही ठहराया है।
कुल मिलाकर बात अगर स्वतंत्रता की करें तो वहां तक सबकुछ ठीक नजर आता है, लेकिन जब आजादी के मायने स्वच्छंदता का रूप धर लेते हैं, तो विकृति नजर आने लगती है। असली आजादी, गरिमा और मर्यादा की परिधि में रह कर वैचारिक रूप से परिवर्तन लाने की कोशिश को कहा जाना चाहिए, ना कि सिर्फ डिस्को थेक में अपना समय गुजारने और सेक्स तथा हिंसा को अपनी जिंदगी का लक्ष्य बना कर चलने को। ऐसा न हो कि स्वतंत्रता की आड़ में स्वच्छंदता को प्रोत्साहित कर अपनी ही जड़ें खोखली कर लें और खून-पसीने से मिली आजादी का इस्तेमाल हमें विकास की बजाय विनाश की ओर ले जाए।
सर्वेश पाठक

Tuesday, July 30, 2013

थाली में बंटती मौत

‘मिड-डे मील’ का कहर  

बिहार: 23 मौतें, उत्तराखंड: 25 बीमार, हरियाणा: 301 बीमार, मध्यप्रदेश: 33 बीमार, गोवा: 19 बीमार, उड़ीसा: भोजन में कीड़ा, महाराष्ट्र: 87 बोतल टॉनिक एक्सपायर्ड, महाराष्ट्र: अकोला 67 छात्राएं बीमार। 

मिड डे मील की सचाई

बिहार में मिड डे मील की थाली में बंटी मौत के जहर ने देश को हिला कर रख दिया। अभी उस घटना पर क्रोध में लिपटी प्रतिक्रियाओं का दौर जारी ही था कि देश के अन्य कई राज्यों से मिड डे मील संबंधी सरकारी तंत्र में लगे दीमक का खुलासा होने लगा। उत्तराखंड में महाप्रलय से बचे-खुचे नौनिहाल थाली के जहर का शिकार होने लगे और 25 बच्चे अस्पताल पहुंच गए। फिर, हरियाणा 301 स्कूली बच्चे मिड डे मील के बाद दी जाने वाली स्वास्थ्यवद्र्धक गोलियों से अस्वस्थ हो गए। यह सिललिला थमा नहीं और मध्यप्रदेश के बालाघाट में 33 बच्चे जहरीले भोजन का शिकार हो अस्पताल पहुंच गए, फिर गोवा में 19 छात्र बीमार पड़े। उड़ीसा में दोपहर के भोजन में कीड़ा मिला, तो झटपट वितरण रोका गया। ताजा घटना महाराष्ट्र के अकोला की है, जहां 67 छात्राएं खाना खाकर बीमार पड़ गईं, जिनमें 20 की हालत गंभीर है।
कुल मिलाकर देशभर में सैकड़ों बच्चे ‘मिड-डे मील’ का शिकार रहे हैं, लेकिन न तो शासन-प्रशासन को फर्क पड़ रहा है, न ही केंद्र या राज्य सरकारें इसके प्रति गंभीर हैं। सभी राजनीति· दल अपने-अपने तईं खुद की या फिर अपने नेताओं की मार्केटिंग में व्यस्त हैं, न तो किसी को देश की जनता से सरोकार है, न ही ‘मिड-डे मील’ की आड़ में ‘जहर-खुरानी’ का! उन्हें तो बस हाय धुन ‘धन’, हाय धुन ‘वोट’ और हाय धुन ‘कुर्सी’ से मतलब है। कोई देश की गरीब आबादी को 5 रुपये में, तो कोई 12 और कोई 33 रुपये में भर पेट भोजन कराने जैसा मजाक कर रहा है। पहले इक्का-दुक्का नेता मानसिक दिवालिएपन का शिकार लगते थे, अब ज्यादातर ऐसे हैं, जिनका मानसिक स्तर उनके उद्बोधनों से स्पष्ट हो जाता है। जनता के बीच से निकले, जनता द्वारा चुने गए ये जनार्दन कब दावानल बन गए समझ ही नहीं आया और जनता है कि मूकदर्शक बन इन नेताओं की ठिठोली आत्मसात कर रही है। अब तो लोग भ्रमित होने लगे हैं कि चुनाव आने पर वोट किसे देंगे, क्योंकि सस्ता भोजन, जहरीली थाली किसी एक राजनीतिक दल या सरकार की थाती नहीं रही! लोगों को यह भान भी नहीं होगा कि वह किस कदर इन सत्ता लोलुप नेताओं के चंगुल में फंसकर अपना एक मौका (वोट देने का) बेवजह और आसानी से गंवा देते हैं।
अब कहें भी, तो कैसे कहें कि ‘जागो इंडिया, जागो’, क्योंकि दिन चढ़े घंटों हो गए, जनता को लगता है कि यह भोर की नींद है, सो वह नेताओं के दिखाए दिग्भ्रमित करने वाली सुंदर, लुभावनी, सजीली व सपनीली दुनिया में गहरी निद्रा में लिप्त है। 
सर्वेश पाठक

Monday, July 8, 2013

इंडिया में नेताओं की मौत नहीं, मौज होती है!


The monday's BIG news is... China's former railways minister Liu Zhijun was sentenced to death with a two-year reprieve here on Monday for bribery and abuse of power. As well as the suspended death sentence, the Beijing No. 2 Intermediate People's Court deprived the 60-year-old of his political rights for life and confiscated all his personal property for taking bribes. Liu was also sentenced to 10 years in jail for abuse of power, according to the court verdict.   


चीन के सरकारी मीडिया के मुताबिक़ एक अदालत ने पूर्व रेल मंत्री लियु झिजुन को भ्रष्टाचार और सत्ता के दुरुपयोग का दोषी करार देते हुए निलंबित मौत की सजा सुनाई है। लियो झिजुन पर पिछले 25 वर्षों के दौरान एक करोड़ डॉलर की रिश्वत लेने के आरोप थे।

अब भारत के परिप्रेक्ष्य में देखें, तो यहां पद के दुरुपयोग करने वाले नेताओं की फेहरिस्त काफी लंबी है। शायद ही कोई ईमानदार नेता मिले, जो शिख से नख तक साफ-पाक हो। लेकिन यहां सजाए मौत तो दूर, ऐसे नेताओं की मौज ही मौज है। तमाम बुद्धिजीवी अपने-अपने तईं ऐसे लोगों पर कार्रवाई की मांग करते रहे हैं, लेकिन क्या मजाल ऐसा कोई कानून पारित हो जाए, जो भ्रष्टाचारियों को शिकस्त दे सके। अभी भी लोगों के जेहन में अण्णा हजारे ताजा हैं, जिन्होंने अपने आंदोलन से देश में नई क्रांति छेडऩे की कोशिश की, लेकिन नेताओं की ऐसी जमात जुटी कि न तो अण्णा का आंदोलन रहा, न ही अण्णा के सहयोगी उनके साथ रहे। और तो और बाद के दिनों में ऐसे खिचड़ी आंदोलन हुए कि देश की जनता (जो कुछ झिंझुड़ी थी) फिर मान बैठी कि उसका पोरसा-हाल जानने-पूछने वाला नहीं है। पद लोलुपता में सने-पुते नेता, मंत्री सभी यथावत हैं। अब यही लगता है कि कौन जलाए मशाल-ए-करप्शन, सब देखने-सुनने की बातें हैं। 
-आपका, सर्वेश...

Sunday, July 7, 2013

ब्लास्ट के बाद, जागो रे...!

अजीब विडंबना है इस देश की..! यहां खतरे की घंटी खतरे के बाद बजती है। बोधगया में सीरियल ब्लास्ट हुए, इसके बाद देश भर के चुनिंदा राज्यों व शहरों में हाई अलर्ट घोषित कर दिया गया। अपने-अपने तईं नेताओं ने भाषण शुरू कर दिए, सुरक्षा-व्यवस्था का जायजा लिया जाने लगा, जगह-जगह दर्शाया जाने लगा कि हम कितने सतर्क और जागरूक हैं?
यह सिलसिला पहली बार नहीं है, 1993 में हुए मुंबई बम धमाकों के बाद से हर बार रटे-रटाए डायलॉग सुनने में आने लगे। नेताओं की ओर से आतंकवाद को कड़ा जवाब देंगे, ऐसे हमले बर्दाश्त नहीं करेंगे, हमारी सुरक्षा-व्यवस्था मजबूत है, यहां परिंदा भी पर नहीं मार सकता सरीखे वक्तव्य लोगों को भ्रमित करते आ रहे हैं। चैनलों-अखबारों में बहस चलाई जाती है, चर्चा-सत्र होते हैं, डिबेट चलाते हैं, कैंडल मार्च निकलते हैं, सरकार-प्रशासन को बाहर बैठे लोग जी-भरकर कोसते हैं, फिर धीरे-धीरे सब नॉर्मल हो जाता है। पब्लिक भी अपनी दिनचर्या में लग जाती है। ..और यह सब तब तक नॉर्मल रहता है, जब तक कि दोबारा कोई ब्लास्ट जैसी घटना नहीं हो जाती! 
आखिर, इस तरह के हाई अलर्ट घटना होने से पहले क्यों नहीं होते, क्या सिर्फ ब्लास्ट होने का इंतजार किया जाता है कि जब ऐसा कुछ होगा, तो हाई अलर्ट किया जाएगा और अगर हाई अलर्ट रहता है, तो घटनाएं क्यों होती हैं? क्या हमारा सुरक्षा तंत्र हमें चैन से सांस लेने का भी मौका नहीं दे सकता? अगर, सुरक्षा तंत्र फेल है, तो भ्रम में रखने के लिए बनावटी बातें करने का क्या मतलब? 

Wednesday, June 26, 2013

जिंदगी को करीब से देखो, इसका चेहरा तुम्हें रुला देगा

आजकल हर किसी पर फेसबुक फीवर छाया हुआ है। पत्रकार हों या बेकार, स्टूडेंट्स हों या कामगार, तथाकथित पढ़े-लिखे हों या गंवार, कामकाजी हो या घरेलू शायद ही कुछ लोग होंगे, जो मामूली टेक्नोसेवी होने के बावजूद इस नेटवर्किंग साइट से न जुड़े हों। इनमें ज्यादातर लोग मूल्यों को ताक पर रखकर अपडेट हिट और लाइक्स के लिए जूझते नजर आते हैं। एक पत्रकार होने के नाम पर इस फेसबुकिया नाम की खुजली मुझे भी लग गई, फिर क्या था शुरू हो गया सिलसिला। लेकिन, हाल की एक घटना ने मन क्षीण कर दिया। 
एक मित्र कुछ हफ्ते पहले बनारस (काशी) की कमियां गिनाते हुए अपडेट कर दिए कि वहां तो गंगा में लाशें बहाई जाती हैं, कब डुबकी लगाते वक्त आपसे कोई लाश टकरा जाए। उस वक्त मैंने उन्हें टोका- भाईसाहब वहां लाशें बहाई नहीं जलाई जाती हैं, संभव है कहीं दूर दराज से लहरों में भटक आई कोई लाश तैरती दिख जाए, लेकिन इसका यह मतलब नहीं कि आप काशी की गंगा में लाशें तैराने लगें। बाद में मैंने उन्हें फोन पर भी टोका कि फेसबुक विश्वमंच है, इस पर अपने शहर या देश की कुंठित तस्वीर न रखें। 
बहरहाल, यह तो एक पहलू था। हाल में, उन्होंने बनारस की तारीफों में लिपटे कई अपडेट किए और बनारस से इश्क तक की बात कर डाली, लोगों को भी बनारस में डूबकर महसूस करने की सलाह दी। इस बार मैंने रिएक्शन दिए बगैर और किसी का नाम लिए बिना खुद अपडेट किया कि एक शहर से नफरत करने वाले उसे प्यार कैसे करने लगे। शायद यह टीआरपी का खेल है, जो गिरगिट की तरह रंग बदलने वालों ने शहर को अपनी लोकप्रियता का माध्यम बना लिया। यह कुछ नहीं, टीआरपी का खेल है। बस, फिर क्या था! शुरू हो गई शाब्दिक जंग और वे सीधे-सीधे नाराजगी जताने लगे। 
इतना ही नहीं, उन्होंने यह चिढ़ पहले मेरे अपडेट पर रिएक्शन देकर निकाली, फिर अपने लगातार अपने अपडेट देने लगे। वे ऐसे नाराज हुए जैसे यह राष्ट्रीय बहस का मुद्दा हो और मैं उन्हें प्रधानमंत्री बनने से रोक रहा हूं। बहस को अजीबो-गरीब मोड़ देते हुए वे शहर और शख्सियत की पड़ताल पर उतर आए। साथ में शुरू हो गई लॉबिंग, उन्होंने कई सहयोगियों को साथ लपेटा और जुट गए साबित करने पर कि मैं बेवजह उन्हें झुठला रहा हूं। 

दोहरे चरित्र का भयानक रूप 

कुल मिलाकर मैं समझ गया कि यह इंटरनेट है ही ऐसी चीज, जो कुछ भी उलट-पलट कर सकती है। यही वजह है कि उत्तराखंड में महाप्रलय आया, तो तमाम मीडिया ने अपने-अपने तईं उसे उछाला, परोसा। किसी ने इस मानवीय आपदा से खबर चुराई, तो कोई पुराने और झूठे वीडियो दिखाकर टीआरपी बढ़ाया। यही दृश्य फेसबुकियों के टीआरपी बढ़ाने की तकनीक में दिखा। बनारस से जुड़े अपडेट में शहर का भला हो, न हो! मित्रों के अपडेट पर अपडेट होते गए, लाइक्स और कॉमेंट्स की संख्या बढ़ती गई। आखिरकार, मैंने सोचा कुछ भी बोल, लिखकर पीछा छुड़ाओ! अन्यथा इस फेसबुक के चक्कर में बरसों पुरानी मित्रता लडख़ड़ा जाएगी। फिर एक गजल की लाइन मन में कौंध गई- 
जिंदगी को करीब से देखो, इसका चेहरा तुम्हें रुला देगा!!

-सर्वेश पाठक 

Thursday, July 8, 2010

‘बंद, मतलब बंद!’

कमरतोड़ महंगाई से जनता बेहाल है, लेकिन सरकार को जैसे कोई फर्क ही नहीं पड़ रहा है। हाल ही, में विपक्ष ने भारत बंद किया, कई जगहों पर यह सफल भी रहा, खासकर मुंबई में! लेकिन, इस शहर की फिजा कुछ अलग ही है, जहां हर खबर अपना असर जरूर दिखाती है। यहीं हाल, बंद की खबर का रहा।


यहां बंद बेहद कारगर रहा, खासकर टैक्सियां-ऑटो के चक्के तो रात में ही बंद हो गए। बंद विपक्ष का था, यहां शिवसेना ने कहा ‘बंद, मतलब बंद!’, इस पर महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना ने भी अपनी सहमति की मुहर लगा दी। फिर क्या था, जब बंद को दो-दो सेनाओं का बल प्राप्त हो जाए, तो फिर किसकी हिम्मत है, जो फैसले पर विरोध जताए। कौन रणबांकुरा है, जो समझाने की कोशिश करे, कि जनाब! महंगाई रोकने के लिए बंद की बजाय अन्य पहलुओं पर भी विचार किया जा सकता है। लेकिन, नहीं! सुझाव तो दूर, अगर आपात परिस्थिति में भी कोई नजर आ गया, तो वाहन के साथ-साथ अपने भी हाथ पैर तुड़वाने को तैयार रहे।

इतना ही नहीं, बंद समर्थकों को तो बस विरोध दर्शाना था, कुछ टीवी चैनलों को फोन घुमाया, फिर कुछ मिनटों के लिए लोकल ट्रेनें रोकीं, विजुएलिटी हुई। इसके बाद फोटो खिंचवाए और चल पड़े अखबारों के दफ्तर, ताकि अगले दिन बंद की गूंज अखबारों के मार्फत घर-घर ही नहीं, देश भर में गूंजे और गली मुहल्लों के नेता भी अपनी पार्टी प्रमुख की नजर में आ आगामी चुनाव के लिए अपना अनुभवी डाटा तैयार कर लिए। ये तो ऐसे बहाने हैं, जिनमें शहर की रफ्तार रोककर बोलते हैं, जनता समर्थन कर रही है। ये कौन बताए कि जनता को आंदोलन नहीं महंगाई पर लगाम चाहिए!

Wednesday, November 25, 2009

26/11... नमन या जश्न!

26/11 की बरसी है! लेकिन, यहां नमन की जगह जश्न जैसा रूप दिया जा रहा है 26/11 की घटना को! अटपटा जरूर लगता है, पर मीडिया पूरे जी जान से जुटा है 26/11 की घटना के जख्मों को कुरेदने के बहाने अपने अपने स्तर पर दर्शकों, श्रोताओं और पाठकों को रिझाने में! जिसे देखो, जहां देखो, वहीं 26/11 का राग अलाप रहा है, शायद ही कुछ लोग होंगे, जो सही मायने में शहीदों को याद कर तहेदिल से नम होंगे। बाकी तो बस... जुटे हुए है अपनी अपनी भुनाने में, कैसे करें, क्या करें कि सबका फोकस हमारी ओर हो जाए, हद तो तब हो गई है, जब शहीद पुलिस अधिकारियों की विधवाएं भी मीडिया में छाए रहने को आतुर दिख रही हैं।
कसाब को जिंदा पकडऩे के चक्कर जान गंवाने वाले शहीद तुकाराम ओंबले की लड़की वैशाली को बीते दिनों एक स्कूल ने तीन लाख रुपए की सहायता राशि दी, पर उसने राशि लौटाते हुए अनुरोध किया कि यह रकम जरूरतमंद बच्चों के कल्याणार्थ इस्तेमाल की जाए। वहीं, कुछ शहीद पुलिस अधिकारियों की विधवाएं हाल ही में दिल्ली जाकर सोनिया गांधी से मिलीं और उन्हें याद दिलाया कि उनके परिवार को पेट्रोल पंप दिए जाने का वादा किया गया है। श्रीमती गांधी ने भी आनन फानन में तत्काल पेट्रोलियम मंत्री मुरली देवड़ा को फोन कर शहीदों की विधवाओं को पेट्रोल पंप देने को कहा, साथ ही अन्य सहायता का भी आश्वासन दिया। जबकि, इन विधवाओं के सहायतार्थ हर महीने एक बड़ी रकम दी जाती है। इतना ही नहीं, इनमें एक शहीद की विधवा की डायरी आगामी 5-6 महीनों तक विविध आयोजनों के लिए व्यस्त कार्यक्रमों से भरी पड़ी है। ये विधवाएं जहां तहां कार्यक्रमों में मुम्बई पुलिस को कोसती नजर आ जाती हैं, पर कोई इनसे यह नहीं पूछता कि उसी प्रशासन मेें इनके पति भी तो थे और वे भी उतने ही जिम्मेदार थे, जितना मुम्बई पुलिस का आम सिपाही! मुम्बईकरों या देशवासियों को शहीद अधिकारियों की विश्वसनीयता या शहादत पर संदेह नहीं, पर एक प्रश्न सहज ही बार बार उठता है कि तीन आला अधिकारी एक साथ एक गाड़ी में कैसे घूम रहे थे, यह संयोग भी कैसे बन गया और आतंकवादी बिना जोखिम कैसे इतने तेज तर्रार पुलिसवालों को शहीद बना डाले? शहादत के बाद इस तरह की बातें अनुचित जरूर है, पर क्या वे विधवाएं भावनाहीन हो गई हैं, जिन्हें पति की शहादत पर पेट्रोलपंप चाहिए?